वैश्या

वो वैश्या थी, और उसके जाँघों पर, पीठ पर, ज़ख्म के निशान थे ! ये निशान यूँ ही दिखते नहीं थे, बदन के उन हिस्सों पर थे जो अक्सर कपड़ों से ढक जाया करती थी ! पर हार रात जब वो किसी हारे हुए मर्द के सामने नंगी होती थी, तो ज़ख्म दिखते थे ! और इन ज़ख्मों को देख कर हर हारा हुआ मर्द दुस्साहसी हो जाया करता , इन ज़ख्मों में कईयों ने अपने पुरुषार्थ की जीत को देखा था ! और शायद इसी लिए, हर उस रात के बाद, उन ज़ख्मों का दायरा बढ़ता ही चला गया था ! और एक दिन उसके पूरे बदन में बस ज़ख्म ही बचे थे ! ये वो दिन था जिसके बाद वो वैश्यावृत्ति के लिए अयोग्य हो गई ! तीन महीने होने को आये पर उसके कपडे रातों को सही सलामत ही रहे ! इन्ही महीनो के तरह तीन साल भी बीते अब वो वैश्यावृत्ति से बाहर थी, लेकिन एक समाज था उसके आस पास, जो उसे अब भी वैश्या कहता था ! और शायद तब तक कहता ही रहेगा जब तक, उसके बदन के ये निशाँ शमशान में लकड़ियों के ऊपर जल कर राख न हो जाये.

और शायद यहाँ भी समाज न रुके और मरने के बाद भी, बाहर के मुहल्लों में एक वैश्या के मौत की ही खबर जाए ! “मैं इसी उहापोह में हूँ कि एक वैश्या जी तो लेती है, पर एक वैश्या कभी मर नहीं पाती!

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सब कुछ कंप्यूटराइज्ड हो गया…

सब कुछ कंप्यूटराइज्ड हो गया है…रिश्ते भी, एकदम मशीनी… जब तक साथ होते है तभी तक साथ होते है। उसके बाद फिर सब वैसा ही….!

यादें अब याद नहीं रहती…. चीज़ें कम कचोटती है… खुलकर हँसते नहीं, खुलकर रोते नहीं…दिल जल्दी बहल जाता है… किसी को ज़्यादा मिस नहीं करते…. अगर कुछ अच्छे वक़्त याद आते भी है तो मन को समझा लेते है…..मन समझ भी जाता है क्यूंकि दिमागी प्रोग्राम सेट करके रखा है कि मन को समझना ही होगा….. लोग, समाज, मान्यताओं, परिस्थितियों के प्रेशर में होता है बेचारा मन….कमज़ोर दिखना मना है, क्या करे ? समझ जाता है….!

बस तो कमज़ोरियों को छुपाने के लिए, खुद को हमेशा सही और समझदार दिखाने के लिए मन को मारते जाते है….मन और ज़ज़्बातों को मशीनी बनाते जाते है… बचपन से मन को कैसे, कब और कहाँ मारना है यही समझाते आये है लोग… कोई बग़ावत करना नहीं सिखाता….क्यूंकि उसमें तकलीफें है….!

जाने कब हम मन को मारना नहीं, मन से जीना सीखेंगे ?
जाने कब हम बग़ावत करना सीखेंगे? 😖😖😖

पुराने वक़्त

अब जब भी ये मन उदास होता है लगता है कोई अपना पास है…..
कभी कभी यूँ ही बैठकर सोचते है वो भी क्या दिन थे जब एक पल के लिए भी अकेले नहीं होते थे …. हमेसा कोई ना कोई दोस्त साथ होते थे ….कुछ तो ऐसे थे कभी भी कही भी मिल जाते थे …. जब भी मन उदास होता कोई ना कोई साथ रहता ही था ….जब भी कहि अकेले घूमने जाओ पीछे से आवाज आ जाती थी, और बता बे अकेले -अकेले घूम रहा है या कोई आने वाली है, कमीने तूने सेटिंग कर ली और अपने भाई को नहीं बताया, चल जल्दी से नाम बता 😁😁😁 ……! फिर समय बदला , दोस्तों में से किसी के पास आज टाइम नहीं है ….दोस्त सिर्फ फोन और सोसल मिडिया से जुड़े है उसमे भी समय का अभाव कभी हमारे पास नहीं तो कभी उनके पास समय नहीं होता है …..! हमेशा दोस्तों से घिरे रहने वाले के पास आज एक भी ऐसा दोस्त नहीं है जिसके साथ अपने सुख दुःख बाँट सके !
जब भी कभी मूड खराब या परेशान होते है तब महसूस होता है ऐसा कोई हमारे साथ हो जो हमें दिलासा दे …! खुशियाँ तो सबके साथ बांटी जा सकती हैं, लेकिन दुःख किसके साथ बांटे ? कभी कभी अकेले में रोने को बहुत मन करता है, क्यों -किसके लिए कुछ पता नहीं चलता है ! बस उस वक़्त मन हिसाब -किताब लगाते रहता है क्या खोया क्या पाया …! फिर खुद ही मन को समझाते है अब वक्त बदल चुका है , शायद जरूरत पड़े तो फिर कोई याद करे … इंसान कितना भी प्रैक्टिकल बनने की कोशिस करे लेकिन दिल भावनाओं से मुक्त नहीं हो पाता है ….! पुरानी यादो से पीछा छुड़ाना नामुमकिन होता है ! कभी कभी मन करता है की लौट जाऊं पुरानी राहो पर फिर ख्याल आता है इतना आगे बढ़ने के बाद पीछे लौटना सम्भव नहीं है ! अब सब कुछ बदल गया है, कुछ भी अब पहले जैसा नहीं रहा है …..!

वैसे भी जिंदगी रुकने का नाम नहीं है चलते रहो ! 😖😖

खुद को संभालना

अच्छा सुनिए,
ये जो रिश्ते होते है न, दिल वाले, चाहे दो सप्ताह हो या दो महीना या सालों पुराना हो, टूटता है तो दर्द होता है और होना भी चाहिए।

अगर कुछ टूटा और दर्द नही हुआ, बिखर कर रोना नही आया, रात के सन्नाटे को आपकी सिसकियों ने आबाद नही किया, तो समझ लिजयेगा की दिल वाली कोई बात नही थी, उस बंधन में।

और जो सुबह जगे तो तकिए का वो करवट गिला हो, आँखे सूजी सी लगे और सिर घूमता महसूस हो, मोबाइल की सुनी स्क्रीन देख कर फिर से, यूँ ही बेवजह आँसू बहने लगे तो समझ लीजिएगा की आपने अपने हिस्से का रिश्ता निभाया है। आपने अपना सब कुछ दिया उस दिल वाले रिश्ते को।

जब तक मन न भर जाए, आँसू ख़ुद टपकने बंद न हो जाए, तब तक रोयीए। कोई गाना सुन कर, किसी मूवी का कोई सीन देख कर, मतलब कह रहें है, पेट भर कर रो लीजिए।

जब लगे की दिल भारी हो रहा है तो, इमोशन को ज़ब्त करने के बजाए, जहाँ है वहीं आँसू निकाल लीजिए, कॉलेज, कैन्टीन,washroom, ऑफ़िस का क्यूब्कल बस रो लीजिए।

ये बिलकुल मत सोचिए की लोग देख रहें हैं, क्या सोचेंगे। आपकी तरह, हमारी तरह, उन सबका दिल भी एक़बार नही, अनगिनत बार टूट चुका होगा। सब उसी रास्ते के हमसफ़र हैं। सो बिंदास रो लीजिए।

तो, अब जब जी भर कर रो लिए, उसके बाद क्या कीजिएगा.??
मातम मना लिए न.?

अब आँसू का एक भी क़तरा भी उस रिश्ते के लिए नही बहाना है। आप कमज़ोर तो बिलकुल भी नही हैं, क्यूँकि कमज़ोर इंसान किसी भी चीज़ में अपना 100% नही देते और आपने तो दिया है।

आप ख़ुद को जितना ब्रेव समझते हैं न, उससे टेन टाइम्स ज़्यादा strong, beautiful, honest इंसान है। आप को खो कर सामने वाले का नुक़सान हुआ है, आपका तो क़तई नही। सच कह रहें हैं, यक़ीन कीजिए मेरा।

अब आपके पास ऐम्पल टाइम होगा, आप फ़ोकस शिफ़्ट कीजिए। वो हाबीज़, शौक़, जो आप उस रिश्ते में रहते हुए, या किसी भी वजह से नही पूरा कर पाए, ये golden chance है, उनको जीने और पूरा करने के लिए।
ख़ुद को ख़ुद से पैम्पर कीजिए। अपने आप से प्यार करना शुरू कीजिए। शुरुआत में टफ़ लगेगा। कितनी बार दिमाग़ में आएगा, छोड़ो किसके लिए सजे-सँवरे, क्यूँ बाहर जाये, कौन नोटिस करेगा।

तो कह रहा हूँ, किसी और के लिए नही, बस एक़बार ख़ुद के लिए तैयार हो कर, अकेले कॉफ़ी पीने निकल जाइए, और कुछ न हो पाए तो सपोर्ट शूज़ निकालिए, अप्बीट वाले सॉंग प्ले कीजिए और aimlessly निकल जाइए, रास्ते आपको अपने साथ किसी ख़ूबसूरत मंज़िल पर ले जायेंगी।

जानता हूँ, थोड़ा लम्बा हो गया। अब क्या ही कीजिएगा, बहुत बातूनी हूँ जो जानते है वो समझ जाएँगे और जो पहली बार पढ़ रहें होंगे वो भी अब जान लेंगे।

मन

“ ये मन होता है न …कभी अपना नहीं होता ….! ये तभी अपना बनता है जब इसे किसी का नाम मिल जाए …तब ये मन अपने आप को धड़कन समझने लगता है ….भाव समझने लगता है ….और इस बात पर इतराता रहता है कि शब्द उसकी बात तो मानेगें ही ….! मन अपनी इसी बात पर बहुत गर्व करने लगता है …इतना गर्व कि उसे इस बात का जरा सा भी डर नहीं सताता कि कभी वह नाम यदि उससे अलग हो जायेगा तो कैसे जियेगा ..? ये मन समय को ….उसकी गति को भी अपने अनुसार चलता मान लेता है …तभी तो जब मन किसी के नाम से धडकता है तो ….न तो समय की परवाह होती है ….न ही किसी अनिष्ट की …..न ही जुदा हो जायेंगे तो क्या करेंगे …? ये सवाल मानों उस पानी की बूँद जैसे बन जाते हैं ….जो बरसती तो बड़े गर्व है रेगिस्तान में ….पर तपती रेत में …ऐसे खो जाती है कि उसे स्वयं पता ही नहीं चलता ….? इसी बात पर चलते हुए ये चंचल मन …अपने आप में जीता रहता है …! कितन अच्छा लगता है ऐसे समय में …..! पर जैसे मौसम बदलते हैं ….कभी अपने अन्दर ऐसे तूफ़ान लिए होते हैं जिनका अहसास ….न तो मौसम को खुद को होता है और न ही प्रकृति को ही रहता है ….ऐसे अचानक सामने आ जाते हैं तूफ़ान …कि कोई कितनी भी कोशिश कर ले बच नहीं सकता …और खो देता है उसमे अपना अस्तित्व …..और जाने कहाँ खो जाता है …! बस कुछ ऐसा ही इस मन के साथ भी होता है …..जब स्वार्थ हावी हो जाता है उस नाम में …जिसके प्यार से ये मन चंचल बना रहता है निश्चिन्त सा ….और वह जुदा हो जाता है …ठुकरा कर ….इस दुनियां के रीति रिवाजों में खुद को बंधा मानते हुए …..तो ये मन ….उस रेगिस्तान सा बन जाता है …..जिस पर यदि पूरा सागर भी अपना प्यार उड़ेल दे ….तो भी वह हरा भरा नहीं बन सकता ….? चाहे कितनी कोशिश कर ले ….अपनी धडकनों को फिर अपनी नहीं बना पाता …..? उसे अपने भावों से नहीं जोड़ सकता …..? कितना अपना सा किन्तु पराया सा अनुभव होता है न ऐसे समय ….? ऐसा लगता है जैसे अब समय ….ये कह रहा हो …मैं तो चलो बूँद बन खो गया था …पर फिर आ गया न ….पर अब तुम कैसे पहले जैसे बन पाओगे ..? ये अनुतरित सवाल ….मन को सदैव बैचेन किये रहता है …और कोई माध्यम नहीं बचता …फिर पहले जैसे मन को बनाने में …..? पर हाँ उसे ऐसी दौलत जरुर मिल जाती है ….जो न तो समय के पास ही होती है ….और न ही उस नाम के पास …जो इस मन को बेनाम बना कर चला गया था …!’

खुद को दिखा रहा हूँ 

आज एक कविता पढा , पढ़कर थोड़ा भावुक हो गया…!कही न कही ये मेरे जीवन की आप बीती को दिखा रही है…शायद आपलोगो को भी पसंद आये …

जो नहीं है वो दिखता नहीं

जो है उसे ही दिखा रहा हूँ

उदास दिल के नगमे को गुनगना रहा हूँ.

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अपनी मजबूरियों का चित्र बना रहा हूँ,

अधूरे अरमानों के रंग से उसे सजा रहा हूँ.

और जो हाथों में टिकता नहीं

अब उसे अपनी जिंदगी में बसा रहा हूँ.

जो नहीं है वो दिखता नहीं

जो है उसे ही दिखा रहा हूँ

उदास दिल के नगमे को गुनगना रहा हूँ.

बारिश के बूंदों की सरगम को बजा रहा हूँ,

भींग रहा हूँ, बारिश में मैं आज नहा रहा हूँ.

सालभर सावन बरसता नहीं,

जो हो रहीं है बारिश उसका लुत्फ उठा रहा हूँ.

जो नहीं है वो दिखता नहीं

जो है उसे ही दिखा रहा हूँ

उदास दिल के नगमे को गुनगना रहा हूँ.

जीवन के भूल भूलैया में खोता जा रहा हूँ,

हँसने की तमन्ना लिए मै रोता जा रहा हूँ.

दिल में गम लिए मुस्कुरा सकता नहीं,

इसलिए अपने हँसी को ही झुठला रहा हूँ.

जो नहीं है वो दिखता नहीं

जो है उसे ही दिखा रहा हूँ

उदास दिल के नगमे को गुनगना रहा हूँ.

हम छोड़ चले है महफ़िल को , याद आये कभी तो मत रोना…😢😢

हम छोड़ चले है महफ़िल को 

याद आये कभी तो मत रोना

इस दिल को तसल्ली दे देना

घबराये कभी तो मत रोना 
एक ख्वाब सा देखा था हमने 

जब आँख खुली तो टूट गया

यह प्यार तुम्हें सपना बनकर

तडपाये कभी तो मत रोना
तुम मेरे ख़यालों में खोकर

बरबाद ना करना जीवन को

जब कोई सहेली बात तुम्हें

समझाये कभी तो मत रोना
जीवन के सफ़र में तनहाई

मुझको तो ना ज़िंदा छोड़ेगी 

मरने की खबर ऐ जान-ए-जिगर

मिल जाये कभी तो मत रोना